नंदकट्ठी ! मोबाइल और इंटरनेट के दौर में जहां पारंपरिक खेल धीरे-धीरे लोगों की जिंदगी से दूर होते जा रहे हैं, वहीं दुर्ग जिले के बोड़ेगांव में आज भी गांव की चौपाल पर सदियों पुरानी चौसर (चौपड़) की परंपरा जीवित है। शाम ढलते ही ग्रामीण एक स्थान पर एकत्र होकर चौसर खेलते हैं और आपसी मेल-मिलाप के साथ स्वस्थ मनोरंजन का आनंद लेते हैं।
चौसर भारतीय संस्कृति का एक प्राचीन खेल माना जाता है, जिसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। मान्यता है कि हस्तिनापुर की राजसभा में हुए द्यूत प्रसंग में इसी परंपरा से जुड़े खेल के माध्यम से पांडवों और कौरवों के बीच घटनाक्रम आगे बढ़ा था। हालांकि आज गांवों में खेली जाने वाली चौसर केवल मनोरंजन, आपसी भाईचारे और सामाजिक मेल-जोल का माध्यम है, इसका जुए से कोई संबंध नहीं है।
ग्रामीणों का कहना है कि चौसर केवल खेल नहीं, बल्कि गांव की सामाजिक संस्कृति का हिस्सा है। इस खेल से धैर्य, रणनीति, एकाग्रता और आपसी संवाद की भावना विकसित होती है। पहले हर मोहल्ले की चौपाल पर यह खेल आम था, लेकिन आधुनिक जीवनशैली के कारण अब यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
बोड़ेगांव के ग्रामीणों ने इस पारंपरिक खेल को आज भी जीवित रखा है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी को मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स के साथ-साथ ऐसे देसी खेलों से भी परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

